Author and 18% GST on book Printing
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जीएसटी ने भारतीय प्रकाशन उद्योग पर मिश्रित प्रभाव डाला है। जबकि कुछ क्षेत्रों को लाभ हुआ है, वहीं अन्य को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

जीएसटी से लाभकर प्रणाली का सरलीकरण: जीएसटी ने विभिन्न प्रकार के अप्रत्यक्ष करों (जैसे कि वैट, सेवा कर, आदि) को समाप्त करके एक समान कर प्रणाली स्थापित की है, जिससे प्रकाशन उद्योग के लिए कर अनुपालन (tax compliance) करना आसान हो गया है।

कैस्केडिंग इफ़ेक्ट का उन्मूलन: पहले, “टैक्स पर टैक्स” लगने से लागत बढ़ जाती थी। जीएसटी ने इस प्रभाव को खत्म कर दिया है, जिससे प्रकाशन सामग्री की अंतिम लागत में कमी आई है।

लॉजिस्टिक्स में सुधार: जीएसटी ने भारत को एक एकीकृत बाजार में बदल दिया है, जिससे राज्यों के बीच सामानों की आवाजाही आसान हो गई है और परिवहन लागत कम हो गई है। इसका सीधा फायदा प्रकाशन समूहों को मिलता है जो पूरे देश में किताबें और पत्रिकाएं वितरित करते हैं।

चुनौतियाँ और नकारात्मक प्रभाव
इनपुट टैक्स क्रेडिट का नुकसान: मुद्रित पुस्तकों को जीएसटी से छूट दी गई है, लेकिन प्रकाशकों को अपनी सामग्री (जैसे कागज, स्याही और छपाई सेवाएं) खरीदने पर जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है। चूंकि वे अंतिम उत्पाद पर जीएसटी नहीं लगा सकते, इसलिए वे इनपुट टैक्स क्रेडिट (input tax credit) का दावा नहीं कर पाते, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है।

प्रकाशन सेवाओं पर कर: प्रकाशन से संबंधित कुछ सेवाओं पर जीएसटी लगता है। उदाहरण के लिए, लेखक की रॉयल्टी (royalty) पर रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के तहत जीएसटी लगाया जाता है, जिससे वितरक इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं उठा पाते हैं।

कॉपी और किताबों की कीमतों में वृद्धि: कुछ रिपोर्टों के अनुसार, जीएसटी के कारण कॉपी और किताबों की कीमतों में 10-15% की वृद्धि हुई है, जिसका भार अंतिम रूप से ग्राहकों पर पड़ता है।

अनुपालन की जटिलता: छोटे और मध्यम आकार के प्रकाशन समूहों को जीएसटी अनुपालन के लिए अतिरिक्त प्रशासनिक लागत और जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।

कुल मिलाकर, जीएसटी ने प्रकाशन उद्योग के लॉजिस्टिक्स और कर अनुपालन को सरल बनाया है, लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट की कमी और कुछ सेवाओं पर कर के कारण उद्योग की लागत में भी वृद्धि हुई है, जिसका बोझ ग्राहकों और छोटे व्यवसायों पर पड़ता है।

जीएसटी (GST) ने भारतीय प्रकाशन उद्योग पर कुछ नकारात्मक प्रभाव डाले हैं, खासकर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) और प्रशासनिक बोझ के संदर्भ में।
📉 इनपुट टैक्स क्रेडिट का नुकसान

मुद्रित पुस्तकों को जीएसटी से छूट दी गई है, जिसका मतलब है कि उन पर कोई जीएसटी नहीं लगता। लेकिन प्रकाशकों को अपनी सामग्री (जैसे कागज, स्याही, और मुद्रण सेवाएं) खरीदने पर जीएसटी देना पड़ता है। क्योंकि वे अंतिम उत्पाद (पुस्तक) पर जीएसटी नहीं लगा सकते, वे इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं ले पाते। इस कारण उनकी लागत बढ़ जाती है, जिससे मुनाफे पर नकारात्मक असर पड़ता है और अंततः किताबों की कीमतें बढ़ सकती हैं।

💼 प्रशासनिक और अनुपालन की जटिलता

जीएसटी प्रणाली, विशेष रूप से छोटे और मध्यम आकार के प्रकाशकों के लिए, काफी जटिल हो सकती है। उन्हें कई प्रकार के रिटर्न दाखिल करने होते हैं, जो अतिरिक्त प्रशासनिक लागत और समय की मांग करते हैं। कई बार उन्हें इन प्रक्रियाओं के लिए पेशेवर सहायता लेनी पड़ती है, जिससे उनका खर्च और बढ़ जाता है।

📈 कुछ प्रकाशन सेवाओं पर कर

लेखकों को दी जाने वाली रॉयल्टी जैसी कुछ सेवाओं पर जीएसटी लगता है। इससे इनपुट टैक्स क्रेडिट की पूरी श्रृंखला बाधित हो जाती है, जिससे प्रकाशकों के लिए लागत में वृद्धि होती है और वे इसका लाभ ग्राहकों को नहीं दे पाते।

संक्षेप में, जीएसटी ने लॉजिस्टिक्स को सरल बनाया है, लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट के नुकसान और अनुपालन की जटिलताओं ने भारतीय प्रकाशन समूह के लिए चुनौतियाँ पैदा की हैं।